ये बन्दा तो देवदूत है…

  
Last Updated:  Saturday, October 17, 2020  "01:44 am"

HAPPY BIRTH DAY LALIT SIR

🔹 नरेंद्र भाले 🔹

यह एक जीती जागती संवेदनाओ से लबरेज कहानी है। मेरे 60 साल के जीवन में केवल तीन ही सिंधी भाई ऐसे आए जो मेरे न केवल हितचिंतक बने बल्कि दोस्ती की मिसाल भी । तीनों का यह मिजाज एक मामले में पूरी तरह मिलता है। निस्वार्थ मदद।
सबसे पहले तो मेरा बालमित्र नानक चेलानी। दोस्तों की मदद करना उसका प्रिय शगल है। बाद में होने वाली आर्थिक परेशानी झेलना उसकी नियति। लेकिन मदद में पीछे ना हटना उसका स्वभाव। कोई भी छल कपट उसके शब्दकोश में है ही नहीं। ऑफिस में प्रवेश हुआ रमेश वाधवा का। पहले यह बंदा तार घर में सपत्नीक कार्यरत था , उसके बाद दोनों ही बीएसएनएल में थे। कैश काउंटर पर हम दोनों ने सेवानिवृत्ति तक साथ में काम किया। इस दौरान तीव्रता से एहसास हुआ कि रमेश तो मेरे ही माजने का है। मुंहफट तथा व्यवहार के मामले में कांच की तरह साफ। कोई लाग लपेट नहीं। इन दोनों में एक ही फर्क रहा नानक अक्सर भूल जाते थे लेकिन रमेश कभी नहीं।
इसी दौर में मुलाकात हुई उस बंदे से जो अधिकारी होते हुए भी सहकर्मी या बेहद समझदार छोटा भाई लगता था। जैसे जैसे पन्ने खुलते गए इस बात का शिद्दत से एहसास हुआ कि अरे यह तो इंसान ही नहीं बल्कि एक सच्चा देवदूत है जो सत्कर्म के लिए ही इस कपटी दुनिया में आया है। इस महामानव का नाम है ललित भाटिया। बीएसएनएल में एक ऐसा दुर्लभ अधिकारी जो किसी भी कर्मचारी की निस्वार्थ मदद करने के लिए 24 घंटे 365 दिन तत्पर रहता है।
खुद के स्वास्थ्य के प्रति बेहद जागरूक ललित दूसरे के स्वास्थ्य की भी उतनी ही चिंता करते हैं। साथ ही एक और जलवा है ललित जी का, राह चलते भी यदि कोई हैरान-परेशान मिल जाए तो चिकित्सा के मामले में या शिक्षा के मामले में उसकी ऐसी मदद करते हैं मानो कोई सगे वाला है। दो जीवंत उदाहरण तो मेरे ही घर के हैं। मेरी दोनों बेटियों को बाम्बे हॉस्पिटल में भर्ती करते समय मेरे पारिवारिक मित्र शैलेंद्र पोरवाल के साथ ललित भी वहां मौजूद थे और सारी कागजी कार्रवाई को दौड़ दौड़ कर अंजाम दे रहे थे। इतना ही नहीं डिस्चार्ज पेपर तथा मेडिकल बिल की फाइल बनाकर मुझे 2 दिन में ही सौंप दी। 10 दिन बाद उनका फोन आया भाले जी बिल जमा किया की नहीं? इस मामले में मैं जितना लापरवाह था ललित उतने ही सजग। उनकी साधिकार डांट खाकर आखिर मैंने बिल जमा करवा दिए। दूसरा मौका तब आया जब आई हेमरेज के कारण मैंने उनसे संपर्क किया और वह तुरंत बोले चलो। 2 दिन बाद फिर उनका ही फोन आया कि भाई चलना नहीं है क्या? उन्होंने डॉक्टर से अपॉइंटमेंट लेकर मेघदूत पार्क ऑफिस में मुझे बुलवा लिया।
वहां से हम एक ही स्कूटर से अस्पताल गए। पता चला लेजर से ऑपरेशन करना पड़ेगा। मैं तो तैयारी से गया नहीं था और डॉक्टर ने कहा मेरे पास समय है अभी ऑपरेशन कर लो। उस समय मेरे जेब में इतने पैसे नहीं थे। ललित ने तुरंत बिल जमा कर मेरा ऑपरेशन करवाया और फिर मुझे घर छोड़कर पैदल ही अपने घर चले गए। वास्तव में ऐसा तो कोई सगा भाई भी नहीं करता। दूसरे दिन उन्होंने ऑटो से मेघदूत पार्क जाकर अपना स्कूटर उठाया।
ऐसी मदद करने वाला बंदा निश्चित ही किसी देवदूत से कम नहीं है। वास्तव में ऐसा करने में उनका कोई स्वार्थ भी नहीं था लेकिन बेचारे आदत से मजबूर जो ठहरे। इस गलाकाट युग में ललित ईश्वर का दिया हुआ है ऐसा वरदान है जो विभाग ही नहीं सारी बिरादरी के लिए भी एक अनुपम उदाहरण है। मेरी नजर में ललित और चार्ली चैपलिन मैं निश्चित एक समानता अवश्य लगती है।
पीड़ित के चेहरे पर मुस्कान लाना जिसमें यह बंदा शत प्रतिशत सफल है। चार्ली ने कभी कहा था कि मैं बारिश में बगैर छाते के चलता हूं जिससे मेरे आंसू दूसरों को नजर ना आए , निश्चित ही ललित उन्हीं के पद चिन्हों पर चल रहे हैं। एक सच्चे देवदूत को उनके 50 वे जन्मदिन पर मेरे शब्द सुमन अर्पित है। आशा ही नहीं मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस सत्यकथा को पढ़कर आपके मुंह से भी निकलेगा जन्मदिन की अनंत शुभकामनाएं ललित सर।

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