तिब्बत को स्वतंत्र देश के रूप में पहचान देगा अमेरिका..? भारत की दृष्टि से भी अहम होगा यूएसए का ये कदम

  
Last Updated:  Saturday, June 6, 2020  "08:32 pm"

*कीर्ति कापसे*

अमेरिका और चीन में जो विवाद चलता आ रहा है उसने अब एक नया मोड़ ले लिया है ।अमेरिका ने एक बिल पेश किया है जिसमें कहा गया है कि तिब्बत को एक स्वतंत्र क्षेत्र मान लिया जाय।
जिससे तिब्बत को स्वतंत्रत देश के रूप में पहचान मिल सके।आपको याद होगा तिब्बत चीन का ऑटोनामस राज्य है ।यदि अमेरिका में यह बिल पास हो जाता है तो ये तिब्बत के लिए बहुत बडी घटना होगी।केवल यही नहीं इस बिल में अन्य कई प्रावधान भी है ।

फ़िलहाल तिब्बत का करंट स्टेटस क्या है ?

इस बिल के आने से क्या प्रभाव पड़ेगा अमेरिका और चीन के सम्बन्धो पर ?

-इन सब का भारत के सम्बंध पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?

तिब्बत मूल रूप से तिब्बत के पठार पर स्थित है ।ये हिमालय के उत्तर में पड़ता है और चीन का ऑटोंनामस राज्य है ।
जिस प्रकार हाँगकांग है, मकाऊ है उसी प्रकार तिब्बत भी ऑटोनॉमस रीजन का स्टेट्स रखता है ।
तिब्बत का इतिहास बहुत लम्बा चौड़ा है लेकिन..ये जानना आवश्यक है कि 1950 में जब चीन में सिविल वार हो रहा था तब चीन ने ख़ुद के क्षेत्र का विस्तार करते हुए तिब्बत पर क़ब्ज़ा कर लिया। उसने तिब्बत से सेवनटीन पोईंट अग्रीमेंट कर लिया था ।तिब्बत में उस समय चौदहवें दलाईलामा का शासन था। इस एग्रीमेंट के तहत सार्वभौमिकता चीन के पास होगी लेकिन तिब्बत के पास भी ऑटोनामस शासन होगा । 14 वे दलाईलामा इस एग्रीमेंट से खुश नहीं थे । उनसे दबाव में ये एग्रीमेंट साइन करवाया गया था।दलाईलामा बेसिकली एक टाइटल है। सन 1949 में जब चीन से यह एग्रीमेंट हुआ था तब ही दलाईलामा का चीनी गवर्मेंट से विवाद हो गया था। उसके बाद वे भारत आ गए थे। वे अपनी गवर्मेंट को एक्जाइल (निर्वासन )में चलाते है। वे
हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला स्थित मैक्लॉडगंज में रहकर निर्वासित जीवन गुजार रहे है। दलाईलामा का असल नाम है टेंजिनगायतसो।
तिब्बत स्कूल ऑफ बुद्धिज्म के हिसाब से ही ये टाईटल उन्हें दिया जाता है ।जिसे येल्लोईजम बुद्धिज्म के नाम से जाना जाता है।
पंचम लामा के बारे में मै बता चुकी हूँ की उन्हें किड्नैप कर लिया था चीन ने …।

पंचेन लामा को वापस करें चीन।

तो अब उस बारे में अमेरिका का कहना है कि 25 साल पहले चीन ने जिस पंचेन लामा को अगुआ किया था ।उसे चीन वापस दे। चीन द्वारा थोपे गए पंचेन लामा किसी को स्वीकार नहीं है ।ये अमेरिका का बड़ा कदम था।
वैसे भी हम सब जानते है कि कोरोंना वायरस की वजह से दोनो देशों के बीच तनाव काफ़ी बढ़ चुका है ।

तिब्बत को मानेंगे स्वतंत्र देश..!

अमेरिका ने स्वीकारा की तिब्बत को अब वे एक स्वतंत्र देश के रूप में मानेंगे ऑटोनामस क्षेत्र के रूप में नहीं।तिब्बत को लेकर पहले भी अमेरिका बिल पास कर चुका है 2002 में …फिर 2008 में भी किया। जनवरी 2020 में भी एक बिल पास किया गया है।

चीन के आक्रामक होने की ये है वजह।

भारत के संदर्भ में कहा जाए तो केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख़ में भारत और चीन के बीच तनाव कोई नई बात नहीं है ।यहाँ सालों से सीमा पर तनाव बना हुआ है ।लेकिन चीन अचानक इतना आक्रामक क्यो हुआ,और क्यो पिछले एक महीने से भारतीय सीमा का अतिक्रमण कर रहा है, उसकी दो वजह है।
1, पहली वजह तो यह है कि पिछले साल अगस्त में लद्दाख़ को केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर दिया है।
2, दूसरी बड़ी वजह है कि जिस तरह भारत सीमा पर बड़े स्तर पर सड़कों और पुलों का जाल बिछा रहा है, चीन उससे भी तिलमिलाया हुआ है ।

बॉर्डर रोड ऑरगनाइज़ेशन की माने तो दुरबुगशह्योक और दौलतबेग ओल्डी रोड स्ट्रेटजिक इम्पोर्टेंट रोड हैं।
भारत के लिहाज़ से ये सड़कें बनाने में नई तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।चार से पाँच महीने में निर्माण कार्य पूरा कर लिया गया।काम समय पर पूरा हो इसके लिए पूर्व में ही सारी प्लानिंग कर ली गई।श्योक़ नदी पर भी पुल का निर्माण किया गया है ।
भारत के सीमा पर आधारभूत संरचना मजबूत करने से ही
चीन भड़का हुआ है।

चीन की कार्रवाई उकसाने वाली।

अमेरिका ने भी भारत का साथ देते हुए चीन के रुख़ की कड़ी आलोचना की है। उसने चीन के व्यवहार को उकसाने और परेशान करने वाला बताया है ।
बता दें कि 38 हज़ार स्क्वेयर किलोमीटर का अक्साई चीन का हिस्सा चीन 1962 में नेहरू के समय से ही कब्जा करके बैठा है।

गाल्वान घाटी पर कब्जा करना चाहता है चीन।

बताया जाता है कि अभी जो वास्तविक lAC है उससे भी तीन किमी चीनी सैनिक अंदर आ गए हैं गालवान घाटी में … और हमें पीछे हटने को कह रहे हैं।
गाल्वान घाटी रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है।इस लिए चीन इसे अपने क़ब्ज़े में लेना चाहता है । चीन ने इस क्षेत्र में 10 हजार सैनिकों को डिप्लाय कर दिया है ।

-चीन के आक्रामक होने के तीन कारण हैं।

1, पूरी दुनिया कोरोना वायरस फैलाने के लिए चीन पर दोषारोपण कर रही है ।

2, आस्ट्रेलिया चीन के विरुद्ध जाँच चाहता था । जिसका भारत ने समर्थन कर दिया।

3, चीन से उद्योग शिफ़्ट होकर वियतनाम जाना चाहते थे। लेकिन उप्र ने लेबर लॉ ख़त्म कर दिया जिससे उद्योग भारत में शिफ़्ट होने के रास्ते खुल गए।इस लिए चीन बौखला कर युद्ध पर आमादा हो गया है।

भारत को बिना डरे डटे रहना चाहिए ।

भय बिना प्रीत कहाँ तो अगर भय और ज़रूरत ख़त्म है तो रिश्ता भी ख़त्म।
चीन का “डर” तिब्बत है।क्योंकि अधिकतर नदियों का स्त्रोत तिब्बत ही है। कहीं तिब्बत उसके हाथ से न निकल जाए यही चिंता उसे सता रही है।
दक्षिणी सागर चीन की ज़रूरत है जो कि पेट्रोल से भरा है। उसे डर है कि कही ये हाथ से निकल न जाए।

ये करना चाहिए भारत को..

भारत को चीन की इन्ही कमजोरियों पर चोट करना चाहिए। क्योंकि पागल से निपटने के लिए पागल बनना पड़ता है ।
भारत को अपनी नौसेना हिंद महासागर में बढ़ानी चाहिए । और चीन के अफ्रीकी ,मध्य एशिया के साथ होने वाले व्यापार को रोक देना चाहिए ।
इसमें अमेरिका भारत का साथ देगा और सारे nato देश भी ।
भारत को एक और कदम उठाना चाहिए ।भारतीय संसद में एक प्रस्ताव पास करना चाहिए कि विश्व के जो देश सम्पूर्ण कश्मीर और सम्पूर्ण लद्दाख़ को भारत हिस्सा मानते है उन्हें व्यापार में छूट और जो ऐसा न माने उनके आयात / निर्यात पर 200% तक टेक्स लगा दिया जाय। ऐसा किया गया तो चीन की स्थिति साँप छछून्दर जैसी हो जाएगी।

( लेखिका कीर्ति कापसे इंदौर की स्वतंत्र पत्रकार हैं। वे सोशल मीडिया पर बेबाकी से अपने विचार रखती रहती हैं। )

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