पर्यावरण संरक्षण में अपनी क्षमता के अनुसार हर व्यक्ति दें योगदान- संघ प्रमुख भागवत

  
Last Updated:  Monday, April 5, 2021  "03:50 pm"

हरिद्वार : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत ने पर्यावरण संरक्षण को भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बताते हुए समाज के प्रबुद्ध और जागरूक लोगों से इस दिशा में अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार सार्थक योगदान करने का आह्वान किया है।
पर्यावरण समिति के तत्वावधान में आयोजित गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए भागवत ने कहा कि ‘पर्यावरण संरक्षण के कामों में तेजी लानी होगी। यह हमारा सामाजिक दायित्व है कि हमने कितने तालाब खुदवाए और कितने पौधे लगाए। अपने काम और काम के परिणाम समाज को दिखाने-बताने होंगे। गतिविधि प्रमुखों को कार्य करने के दौरान स्वयं के प्रचार से बचना चाहिए। हमेशा इस बात पर गौरव और संतोष करें कि हम राष्ट्र निर्माण और मानवता की सेवा में लगे हैं।

बता दें कि पर्यावरण गतिविधि में 1 अप्रैल से हरिद्वार में शुरू हुए कुंभ मेले को पॉलिथीन मुक्त बनाने का आह्वान किया गया है। इसके लिए पर्यावरण समिति महाकुंभ हरिद्वार 2021 का गठन किया है। इस समिति के तहत व्यापारियों, संतों, महिलाओं,शैक्षणिक संस्थानों, गैर सरकारी संगठनों इत्यादि अलग-अलग समूहों की 16 उप समितियां बनाई गई हैं, जो अपने-अपने सामाजिक वर्गों के बीच कुंभ को स्वच्छ बनाए रखने और पॉलिथीन मुक्त बनाने के लिए जागरूकता फैलाने का काम कर रही है। इस सेमिनार में देश के अलग-अलग हिस्सों के 40 विश्वविद्यालयों के उप कुलपतियों ने भी हिस्सा लिया। पर्यावरण समिति देश भर के शिक्षण संस्थानों को भी पर्यावरण संरक्षण के वृहद अभियान से जोड़ना चाहती है।

प्रकृति संरक्षण हिन्दू संस्कृति का हिस्सा।

भागवत ने कहा, ‘ हिंदू परंपरा में प्रकृति संरक्षण अलग से किया जाने वाला काम नहीं है। हमारे लिए यह जीवन का एक हिस्सा है। जो हमारे व्यक्तिगत और समाज जीवन के हर पहलू में शामिल है। पर्यावरण संरक्षण हमारे लिए किताबी ज्ञान या बौद्धिक विमर्श का परिमाण नहीं है, बल्कि प्रकृति से हमारे स्वभाविक प्रेम में यह सर्वदा सम्मिलित है।’
पर्यावरण की बात करते हुए हर किसी के लिए यह समझना बहुत आवश्यक है कि यह सब एक – दूसरे से सम्बद्ध है। आप जल की बात करते हुए जंगल को नहीं छोड़ सकते, या मिट्टी की समस्या पर काम करते हुए जल को नहीं छोड़ सकते। यह तो समाधान का एक पहलू है। दूसरा पहलू है समाज की सम्मिलित शक्ति का उपयोग। व्यक्तिगत प्रयास तो महत्वपूर्ण है ही, लेकिन उसे सामाजिक प्रयास का एक हिस्सा नहीं बनाया जाता, तो हम अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते।

लालच प्रकृति के साथ खिलवाड़ का कारण।

संघ प्रमुख ने कहा, ‘लोभ को पूरा करना प्रकृति के वश में भी नहीं है। हर बात की उपयुक्तता और योग्यता जानने के बाद भी मन का भाव बदलना नहीं चाहिए, परन्तु यह सामान्य आचरण में नहीं होता है।यहीं मानवीय प्रकृति है। इसी लोभ के चलते प्रकृति से खिलवाड़ किया जाता है।

पर्यावरण और विकास एक- दूसरे के विरोधी नहीं।

विकास और पर्यावरण एक दूसरे के विरोधी नहीं है, ऐसा सोचकर विकास का नया इतिहास लिखेंगे।
इतिहास में भी हम विश्व में नम्बर वन थे, बावजूद उसके हमारे यहाँ पर्यावरण से जुड़ी कोई समस्या नहीं थीं।

इतिहास में हम पिछले 6 हजार साल से खेती करके दुनिया को अन्न उपलब्ध कराते आए हैं। बावजूद इसके आज भी हमारे यहाँ की भूमि उपजाऊ है। ये इस बात का प्रमाण है कि हम पर्यावरण के अभिन्न अंग है और पर्यावरण के विकास से ही सृष्टि का विकास है।
मनुष्य के रूप में हम ही सबसे महान हैं, इस अहंकार को त्याग कर हमें पर्यावरण पर विचार करना होगा। हम अपने आचरण को बदल दें, तो निश्चित ही पर्यावरण में भी स्थितियां बदलेंगी।

पर्यावरण को दूषित कर रहे आचरण को बदलना है।

देव संस्कृत विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर डॉ. चिन्मय पांडेय ने अपने सम्बोधन में भारतीय सनातन परंपरा में कुंभ के महत्व को अमृत मंथन की कहानी से जोड़ा। आपने कहा कि संघर्ष की गाथा से ही सौभाग्य की गंगा निकल सकती है। समुद्र मंथन में भी अमृत से पहले विष निकला था वहीँ स्थिति आज पर्यावरण संरक्षण को लेकर बनी हुई है।
आज पर्यावरण की स्थितियों पर विचार इसलिए जरूरी है क्योंकि दुनिया में हो रही हर 8वीं मौत वायु प्रदूषण से हो रही है।

पर्यावरण संरक्षण को लेकर किए जा रहे हमारे प्रयास केवल कुम्भ तक सिमट कर नहीं रहने वाला है। भारत भर के शैक्षणिक संस्थानों के साथ मिलकर हम वातावरण में फैले इस विष को अमृत में बदलने के लिए निरंतर कार्यरत रहेंगे।

इस मौके पर्वसंघ प्रमुख द्वारा पर्यावरण संरक्षण गतिविधि की मासिक पत्रिका ‘Paryavaran Perspective’ का विमोचन भी किया गया। इस पत्रिका के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की दिशा में किए जा रहे सराहनीय प्रयासों को समाज के सामने प्रस्तुत करने का काम किया जाएगा।

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