त्योहारों से बढ़ाएं जीवन की आध्यात्मिक पूंजी

  
Last Updated:  Tuesday, September 14, 2021  "09:44 am"

कोरोना त्रासदी ने जीवन के सत्य पक्ष को उजागर किया है कि शरीर नश्वर है और केवल ईश्वर ही परम सत्य है। हम दुनियादारी की उलझनों में अंतर्रात्मा से मिलन के क्षण को महत्व नहीं देते। स्थितियों और परिस्थितियों से जुझते-जुझते हम स्वयं ही नष्ट हो जाते हैं। तेरा-मेरा, इसका-उसका और अपना-पराया, इन सभी व्यर्थ चिंतन में जीवन के अमूल्य आनंद के क्षणों का क्षय कर देते हैं। हमारी मनोकामनाओं, अभिलाषाओं और इच्छाओं का कभी अंत नहीं होता। एक इच्छा पूरी हो जाए तो दूसरी आ जाती है कि इसकी प्राप्ति हो जाए तो फिर टेंशन खत्म, इसके आगे भी यही प्रक्रिया जारी रहती है।

आधुनिकता की अंधी दौड़ में मनुष्य योनि का मूल उद्देश्य गौण हो जाता है। ईश्वर द्वारा रचित सृष्टि में थोड़े-थोड़े समय के अंतराल में त्यौहारों को स्थान दिया है। ईश्वर का प्रत्येक अवतार, रूप और लीलाएँ मानव योनि की सफलता के कुछ सूत्र प्रतिपादित करती हैं, तो क्यों न इन छोटे-छोटे त्यौहारों में हम अपनी असली पूँजी आध्यात्मिक पेंशन को बढ़ाए। इच्छाओं की सरिता का कोई किनारा नहीं है। शायद ईश्वर के साथ लौ लगाने से हमें जीवन के प्रति अनुकूल व्यवहार करना आ जाए। हम हमेशा परिस्थितियों को निहारते हैं और कहते हैं कि अंत समय में मुक्ति का द्वार खोज लेंगे, परंतु वर्तमान समय में तो आज भी अनिश्चित हो गया है।

विश्वव्यापी कोरोना संक्रमण के बीच हमने एक-एक श्वास पर जीवन को तांडव करते देखा है। अर्थ और पहुँच भी अनर्थ के परिणाम को नहीं रोक सका। विकराल परिस्थितियों ने शव गंगा के प्रवाह को निरंतर गति दी। जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु है जोकि निश्चित है। अनिश्चित को महत्व देते-देते हम निश्चित के आने को अस्वीकार नहीं कर सकते। ईश्वर का सान्निध्य हमारी बुद्धि को भी निर्मल बनाता है। हम सभी इस संसार के हाथों में बंधे है, पर सारा संसार उसके हाथों में है। जीवन का प्रत्येक हर्ष-विषाद समभाव से ईश्वर को सौपते चलें और उसके निर्णय को बिना संशय के स्वीकार करते रहें। तृष्णा से मुक्ति का द्वार ईश्वर उपासना में निहित है। ईश्वर के प्रत्येक अवतार में हमनें उन्हें संघर्षों से अनवरत जूझते हुए देखा है। इसके पश्चात भी ईश्वर स्वयं दोषारोपण से वंचित नहीं रहें, तो फिर हम इस मोहमाया के जाल में क्यों खुद को ठेस पहुँचा रहें है। हम तो उस परम शक्तिशाली ईश्वर का अंश है। यह मनुष्य योनि तो तभी सार्थक है जब हम इसे ईश्वर की स्तुति, स्मरण और सत्कर्म में खर्च करते हैं, तो क्यों न बचे हुए क्षणों में आध्यात्मिक पेंशन को संग्रहीत करें और ईश्वर तत्व में स्वयं को लीन करें।

त्यौहारों से बढ़ाए जीवन की आध्यात्मिक पूँजी।

मुक्ति के द्वारा की यहीं है प्रमुख कुंजी॥

मनुष्य योनि का उद्धार है ईश साधना।

डॉ. रीना कहती, क्यों न हम करें ईश आराधना॥

*डॉ. रीना रवि मालपानी (कवयित्री एवं लेखिका)*
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