बिना परिश्रम के फल की इच्छा अंधविश्वास का आधार बनती है

  
Last Updated:  Sunday, January 22, 2023  "05:03 pm"

अभिलाष शुक्ला इंदौर : इन दिनों जो भी न्यूज चैनल खोलिये, लगभग सभी पर बागेश्वर धाम पीठाधीश्वर पं. धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री के समाचार हैं। किसी में उनके रहस्यलोक को उजागर करने के दावे के साथ उनका साक्षात्कार है तो कहीं उनके चमत्कारों का वर्णन।

वैसे देखा जाए तो सभी प्रमुख धर्मों में इस जगत से इतर किसी अलौकिक जगत के अस्तित्व को स्वीकार किया गया है परन्तु हमारे धर्म में चमत्कारों का विशेष प्रभुत्व है, यहाँ तक कि हम भगवान गणेश की मूर्ति को टनों दूध पिला देते हैं, जिन धार्मिक नेताओं को विभिन्न प्रकार के दुराचारों में लंबी सजाएं न्यायालयों द्वारा दी गई हैं और वे कारागार में हैं, उनके भी भक्त हैं।

विज्ञान तर्क के आधार पर चलता है और आस्था किसी तर्क की मोहताज नहीं होती।आस्था हमेशा अँधी होती है। हमारी आस्था को सहयोग मिलता है हमारे बिना परिश्रम फल प्राप्त करने के स्वभाव के कारण। जो लोग अपने परिश्रम तथा पौरुष को सफलता का आधार मानते हैं वे अँधविश्वास के फँदे में नहीं फँसते। हमारे देश की इतनी आबादी तथा समाज की इतनी जटिल संरचना है, जिसकी वजह से हर तरह का व्यापार फलता फूलता रहता है।

एक संत हुए थे, जय गुरुदेव जिन्होंने लाखों लोगों को टाट पहना दिया था। एक ऐसे भी बाबा हैं जो आपकी समस्या का हल समोसे व हरी/लाल चटनी खिलाकर करते हैं। आप ऐसे लोगों से तर्क नहीं कर सकते और किसी बुद्धिमान व्यक्ति को करना भी नहीं चाहिए। चमत्कार को हम तभी स्वीकार करते हैं जब हम विवेक शून्य हो जाते हैं। आखिर हम जा किधर रहे हैं और हमारी अँध आस्था ने हमें यह सोचने लायक भी कहाँ छोड़ा है।
पर यहाँ यह बात जरूर साबित होती है कि हमारी बहस का एजेंडा मीडिया ही तय करता है। आज के युग में किसी भी महत्वहीन व्यक्ति, घटना को यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण बनाने की क्षमता रखता है और इन्हें इस बात का बखूबी अहसास भी है।
चलो एक बार मान भी लिया जाए कि ऐसे चमत्कार होते हैं, तो भी देश की आर्थिक, सामाजिक समस्याओं को कम करने में इनका क्या उपयोग है, अथवा अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में ये सब हमारे किस काम आ सकता है या ये भी कि हमारी दिनचर्या में इनसे क्या प्रगति हो सकती है।

विश्वस्तरीय उद्योगपति अडानी और अंबानी अपनी बुद्धि कौशल तथा परिश्रम से इतनी ऊँचाई तक पहुँचे हैं न किसी चमत्कार से, फिर जैसा जिसकी समझ में आए, हम तो आस्था के सामने नतमस्तक हैं।

नोट : (लेखक इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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