स्वावलंबन का अर्थ दुनिया से आइसोलेशन नहीं है

  
Last Updated:  Tuesday, January 24, 2023  "05:24 pm"

राजा भोज सभी विधाओं में दक्ष थे।

लोक साहित्य जनसामान्य को अपनी मिट्टी से जोड़ता है।

इसतरह के मंथनों से इतिहास की सही जानकारी लोगों तक पहुंचेगी।

नर्मदा साहित्य मंथन भोजपर्व के अंतिम दिन विभिन्न वक्ताओं ने अलग – अलग विषयों पर रखी अपनी बात।

इंदौर : नर्मदा साहित्य मंथन-भोजपर्व का तीसरा दिन दीप प्रज्वलन, शंखनाद एवं पिछले दिवस के सत्रों के सिंहावलोकन से प्रारम्भ हुआ। प्रथम सत्र में “राजा भोज के साहित्यिक अवदान “ विषय पर डॉ बालमुकुन्द पाण्डेय ने अपने विचार रखे।

राजा भोज की हर विधा पर पकड़ थी।

उन्होंने कहा कि ज्योतिष और खगोलशास्त्र पर भारत का एकाधिकार रहा है।राजा भोज के सारे ग्रंथों पर अगर चर्चा की जाए तो पता चलेगा कि ऐसी कोई विधा नही है जो उनसे छूटी हो।राजा भोज एक सम्पूर्ण राजा थे। उन्होंने पूरे विश्व को केन्द्र में रखकर कार्य किए। आज आवश्यकता हैं कि हमारे पराक्रमी वीर राजाओ के महान गुणों का अनुसरण करें। राजा भोज से प्रेरणा लेकर भारत माता के सिंहासन को दुनिया के सर्वोच्च स्थान पर स्थापित करने का काम हो।सत्र संचालन डॉ मयंक सक्सेना ने किया।

द्वितीय सत्र में “आर्थिक विमर्श – स्वावलंबी भारत” विषय पर डॉ भगवती प्रकाश द्वारा संवाद किया गया। उन्होंने कहा, भारत अनादिकाल से आर्थिक दृष्टि से समृद्ध देश रहा है। स्वावलंबन का अर्थ विश्व से आइसोलेशन नही है।आयात पर अपनी निर्भरता कम करने से देश की अर्थव्यवस्था में सुधार हो सकता है। आर्थिक राष्ट्रनिष्ठा, तकनीकि राष्ट्र निष्ठा और प्रत्येक व्यक्ति को रोजगार इन 3 दिशाओ में कार्य करने से भारत निश्चित ही 40 ट्रिलियन की इकोनॉमी बनेगा। उन्होंने कहा कि
भारत में महिला सशक्तिकरण का प्रमाण यह हैं कि हमारे यहाँ महिलाओं के गुरुकुल रहे हैं। हमें महिला स्वावलंबन के कार्य में लगना होगा। भारत की कृषि भूमि भारत को एक अग्रणी विश्व शक्ति बनाएगा। सत्र संचालन श्री राजपाल सिंह राठौड़ ने किया।

अस्पृश्यता कभी धर्म का हिस्सा नहीं रही।

तीसरे सत्र में ‘सामाजिक समरसता’ विषय पर मोहननारायण ने परिचर्चा में अपने अनुभव को साझा किया। उन्होंने कहा कि अस्पृश्यता भारत के मूल में नहीं रही बल्कि समाज में भेद उत्पन्न करने के लिए इसे षड्यंत्र पूर्वक समाज में स्थापित किया गया। संत रैदास, ज्योतिबा फुले, डॉ भीमराव अंबेडकर जैसे महापुरुषों ने सामाजिक समरसता के लिए सार्थक प्रयास किए। महात्मा गांधी, वीर सावरकर, शहीद भगत सिंह और बाबा साहेब अंबेडकर की सामाजिक आंदोलन में कार्यशैली अलग अलग होने के बावजूद भी इन चारों के विचारों में सामाजिक समरसता के प्रति समान भाव था। सामाजिक स्वतंत्रता के बिना राष्ट्रीय स्वतंत्रता की कल्पना नहीं की जा सकती। भारतीय समाज में अस्पृश्यता के ऐतिहासिक संदर्भों के साथ मोहननारायण ने प्रतिपादित किया कि यह कभी भी धर्म का हिस्सा नहीं रही। इस विचार को प्रत्येक गाँव तक पहुँचाना आवश्यक है। ‘दलित’ शब्द का अर्थ और षडयंत्र पर उन्होंने कहा कि दलित शब्द उनके लिए था, जिनका कभी दलन हुआ हो, जिसमें कुछ विशेष जातियाँ सम्मिलित थी, मगर आज उसका राजनैतिक लाभ लेने के लिए कभी-कभी उसका दुरुपयोग भी किया जाता है।सत्र का संचालन निलेश माहुलीकर ने किया।

लोक साहित्य जनसामान्य को अपनी मिट्टी से जोड़ता है।

चतुर्थ सत्र लोक सहित्य का सांस्कृतिक अवदान
विषय पर मुख्य वक्ता मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी भोपाल के निदेशक डॉ. विकास दवे रहे।
उन्होंने कहा लोक सहित्य प्रत्येक भारतीयों की धमनियों में दौड़ने वाला रक्त है।लोक साहित्य जन सामान्य को अपनी मिट्टी की गंध से जोड़ने का कार्य करता है। सीताजी को माँ कहने वाला तो पूरा देश है परंतु सीता जी को बेटी कहने वाला लोक साहित्य है। विकास दवे ने मंच से आग्रह किया कि बाल साहित्य पर लिखा जाना चाहिए। हमें लोक सहित्य से प्रेरणा लेना चाहिए। लोक इस भारत का पर्याय है जब तक भारत है तब तक लोक है ,जब तक लोक है तब तक भारत है। मध्यप्रदेश सरकार ने बोलियों के साहित्य में पाठ्यक्रम में लाने की व्यवस्था बनाई है,बहुत जल्द हम इस योजना को मूर्त रूप लेते देखेंगे। सत्र संचालन ईश्वर शर्मा ने किया।

इसतरह के मंथनों से इतिहास की सही जानकारी लोगों तक पहुंचेगी।

नर्मदा साहित्य मंथन के समापन सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर ने कहा कि भारत की प्राचीन परंपरा है संवाद करना, मंथन करना, हमारे लिए यह कोई नया विषय नही है क्योंकि हमने अपने साहित्य में अनेक प्रकार के मंथनों की चर्चा पढ़ी और सुनी है। ऐसे मंथन से अमृत निकले और वह अमृत समाज के लिए कैसे उपयोगी हो यह हमारी संस्कृति में हैं। इतिहास की प्रामाणिक जानकारी आने वाली पीढ़ी के सामने रखना है तो इस प्रकार के मंथनो की आवश्यकता होगी। इस मंथन से संस्कृति, परम्पराओ एवं इतिहास की सही जानकारी भी समाज तक पहुंचेगी। उन्होंने कहा जब तक हम विदेशी मानसिकता से बाहर नही आएंगे तब तक हम भारत का पुनर्निर्माण नही कर सकते। नर्मदा साहित्य मंथन में जिन विषयों पर चर्चा हुई हमे इन विषयों पर लगातार लिखना चाहिये, इन विषयों पर फ़िल्म निर्माण करना चाहिए तथा अन्य छोटे छोटे स्थान पर इस विमर्श को ले कर जाना होगा तभी इस मंथन का कार्य पूर्ण होगा।विश्व संवाद केंद्र मालवा के अध्यक्ष
दिनेश गुप्ता ने आभार व्यक्त किया।

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