इंदौर : करप्ट (दिवालिया) एवं ऋणशोधन (रिडेम्पशन ऑफ़डेब्ट) प्रक्रिया से गुजर रही कंपनियों पर जीएसटी और आयकर का प्रभाव विषय पर इंदौर टैक्स प्रैक्टिशनर्स एसोसिएशन और भारतीय कंपनी सचिव संस्थान (ICSI), इंदौर चैप्टर द्वारा संयुक्त रूप से विशेष सेमिनार का आयोजन किया गया।
टीपीए अध्यक्ष सीए जे पी सराफ ने बताया कि इस जटिल विषय को सरल एवं व्यावहारिक तरीके से समझाने के लिए सीए नवीन खंडेलवाल मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि आईबीसी (दिवाला और दिवालियापन संहिता) एक कर्जदाता-प्रेरित प्रक्रिया है जो कंपनियों की वित्तीय पुर्नगठन में मदद करती है।
सीए नवीन खंडेलवाल ने बताया कि धारा 14 के तहत “मोरटोरियम” लगने के बाद टैक्स विभाग कोई भी नया या लंबित मामला नहीं चलाया सकता।
आईबीसी की धारा 238 अन्य सभी कानूनों पर वरीयता देती है, जिससे टैक्स कानून भी प्रभावित होता है।
प्री-सीआईआरपी याने इस प्रक्रिया के पहले टैक्स बकाया वसूली के लिए टैक्स विभाग को इंसोल्वेसी क्लेम फाइल करना होता है।
CIRP के दौरान क्लेम आकलन तभी किया जा सकता है जब इंसोल्वेंसी प्रोफेशनल या लिक्विडेटर जरूरी जानकारी प्रदान करे।
पोस्ट-CIRP टैक्स में पुराने घाटे और डिप्रिसिएशन को आगे ले जाने व समायोजित करने की प्रक्रिया शामिल होती है।धारा 41 के अनुसार, व्यापारिक देनदारी की माफी को आय माना जा सकता है और उस पर टैक्स लगाया जा सकता है।वर्किंग कैपिटल लोन की माफी को यदि पहले डिडक्शन लिया गया हो, तो व्यापार के लाभ में गिना जाएगा।इसके विपरीत लॉन्ग टर्म लोन की माफी को आय नहीं माना जाएगा। महिंद्रा केस इसका उदाहरण है।घाटे और डिप्रिसिएशन की छूट तभी मिलेगी जब आयकर अधिनियम इसकी अनुमति दे। धारा 156A के अनुसार, कोर्ट या ट्रिब्यूनल के आदेश से टैक्स डिमांड को कम किया जा सकता है। आयकर अधिकारी (AO) को IBC के आदेश के अनुसार डिमांड संशोधित करनी होती है।यदि उच्च न्यायालय या एनसीएलएट आदेश बदलता है, तो AO को नई डिमांड नोटिस फिर से जारी करनी होगी।टैक्स विभाग को दिवालिया प्रक्रिया में क्लेमेंट के रूप में शामिल होना आवश्यक है, अन्यथा उसकी वसूली रुक जाती है।
इस संबंध में महत्वपूर्ण केस जैसे ‘महिंद्रा’, ‘घनश्याम मिश्रा’ और ‘ग्वालियर रेयान केस’ ने इस क्षेत्र में दिशा निर्धारित की है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट व अन्य न्यायालयों के महत्त्वपूर्ण निर्णयों का भी उल्लेख किया, जिससे उपस्थित प्रतिभागियों को व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हुआ।
सीएस मनीष जैन ने बताया कि कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी समाधान प्रक्रिया शुरू होने से पहले की जीएसटी देनदारियों को ऑपरेशनल ऋण माना जाता है, जबकि सीआईआरपी के दौरान देनदारियों का पालन जरूरी होता है।
सत्र के अंत में प्रतिभागियों ने कई जिज्ञासाओं को साझा किया, जिनका उत्तर वक्ता द्वारा विस्तारपूर्वक दिया गया। कार्यक्रम का संचालन सीए प्रणय गोयल ने किया।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में टैक्स प्रोफेशनल्स, कंपनी सचिव, सीए व छात्रों ने भाग लिया।








