भारत की सांस्कृतिक बहुलता सराहनीय

  
Last Updated:  November 18, 2023 " 07:49 pm"

लैंगिक असमानता पर काम करने की है जरूरत : प्रो.जॉनसन

पीआईएमआर डिपार्टमेंट ऑफ लॉ द्वारा सस्टेनेबल डेवलपमेंट पर इंटरनेशनल सेमिनार का आयोजन।

इंदौर : सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल जिसे यूनाइटेड नेशन द्वारा वर्ष 2015 में तय किया था, आज के समय में काफी महत्वपूर्ण और ज्वलंत विषय है। इस अभियान के तहत कई सारे मानकों पर तमाम देशों को काम करना था, जिनमें से एक सांस्कृतिक बहुलता भी है। भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां सांस्कृतिक रूप से काफी बहुलता है और मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि कई परेशानियों के बाद भी, भारत अपनी सांस्कृतिक विविधता को काफी अच्छे तरह से संचालित और सरंक्षित कर रहा है। हालांकि कई चिंता के पहलू भी है जिनमें लैंगिक असमानता भी है, भारत में इस दिशा में काफी काम किए जाने की जरूरत है ।

यह बात ओक्लाहोमा सिटी यूनिवर्सिटी, यूएसए की प्रोफेसर डैनी एल. जॉनसन ने प्रेस्टीज इंस्टीट्यूट के डिपार्टपेंट ऑफ लॉ में `रीसेंट एडवांसेज इन सस्टेनेबल डेवलपमेंट इन द एरिया ऑफ मैनेजमेंट, ह्यूमैनिटीज एंड लॉ’ विषय पर आयोजित प्रथम इंटरनेशनल सेमिनार को सम्बोधित करते हुए कही।

प्रोफेसर जॉनसन ने कहा कि सस्टेनेबल डेवलपमेंट लक्ष्य प्राप्ति में लोग, आवश्यक तत्वों में से एक हैं। लेकिन शोध रिपोर्ट में इस तत्व का उल्लेख बहुत कम किया गया है। सस्टेनेबिलिटी, मैनेजमेंट, ह्यूमैनिटीज और लॉ सांस्कृतिक समृद्धि और सामाजिक समानता पर पर्यावरणीय स्वास्थ्य की अन्योन्याश्रयता के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि हम ऐसा जीवन जी सकते हैं जो पृथ्वी या लोगों को नुकसान न पहुंचाएं और ऐसी दुनिया बनाएं जहां सस्टेनेबिलिटी पूरी दुनिया को प्रभावित करती हो।

सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए अटूट प्रतिबद्धतता।

प्रेस्टीज एजुकेशन फाउंडेशन के चेयरमैन डॉ. डेविश जैन ने कहा कि यह सेमिनार सस्टेनेबल डेवलपमेंट के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। वर्तमान में सस्टेनेबल डेवलपमेंट की प्रथाएं केवल एक कॉर्पोरेट चर्चा नहीं बल्कि एक दीर्घकालिक चर्चा बन चुकी है। यह उज्ज्वल भविष्य के रास्ते में आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए अटूट प्रतिबद्धता हैं।

कानून में सुधार, नए जुड़ाव की जरूरत।

डिपार्टपेंट ऑफ लॉ डायरेक्टर डॉ राजा राय चौधरी ने अपने संबोधन में कहा कि कल के कानून आज और भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी नहीं हैं। इनमें सुधार और नए जुड़ाव की जरूरत है। यह सेमिनार इसी दिशा में एक प्रयास है । उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि डिपार्टमेंट ऑफ लॉ में पहली बार इस तरह के इंटरनेशनल सेमिनार का आयोजन हो रहा है। यह पहल सराहनीय है और न केवल डिपार्टमेंट बल्कि शैक्षणिक जगत के विकास के लिए भी अच्छी है । सेमिनार के को ऑर्डिनेटर डॉ. नंदन वेलंकर, प्रोफेसर नकुल सिंह चौहान, प्रोफेसर ईशा जोशी ने बताया कि सेमिनार में देशभर के रिसर्च स्कॉलर, विद्यार्थियों और फैकल्टीज ने अनेक विषयों पर रिसर्च पेपर प्रस्तुत किए।

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