मार्जिन का मतलब समझाया सरोज कुमारजी ने

  
Last Updated:  September 6, 2021 " 01:02 am"

🔻कीर्ति राणा

शिक्षक दिवस पर मुझे तीन शिक्षकों की खास तौर पर याद आ रही है। एक पीएमबी गुजराती आर्टस कॉलेज के दौरान हिंदी के प्रोफेसर रहे कवि सरोज कुमार जी, जिन्होंने कॉपी में मार्जिन छोड़े जाने का मतलब समझाया।दूसरे महाराजा शिवाजीराव उमावि में शिक्षक रहे विजय सिंह कौशल सर, जिनकी तिकड़म से मेरा घर बिजली के उजाले से रोशन हुआ, रेडियो आया और तीसरे हिमाविक्रं 30 के शिक्षक-सांई भक्त महेश चंद गुप्ता सर, जिनकी वजह से स्वावलंबी बनने-बचपन से नौकरी करने की राह पकड़ ली।इन शिक्षकों को याद करते हुए मैं सभी गुरुजनों को प्रणाम करता हूं।

🔻मार्जिन का मतलब समझाया सरोज कुमारजी ने।

सरोज कुमारजी से जुड़ा किस्सा यूं है कि मेरी आदत थी कॉपियों में मार्जिन वाली जगह से ही लिखने की।मुझे लगता था ये स्पेस का उपयोग कॉपी में नोट्स के लिए अधिक स्थान मिल जाता है। एक दिन कॉपी जांचते हुए सरोज कुमार जी ने पूछ लिया कॉपी में इस मार्जिन छोड़े जाने का मतलब समझते हो।अपन ठहरे मुंहफट, कह दिया सर आप ही समझा दीजिए। उन्होंने कहा तुम समझते हो इस जगह पर लिख कर तीर मार रहे हो…! याद रखो जिस तरह कॉपी में यह मार्जिन छोड़ा जाता है वैसे ही जिंदगी में, रिश्तों में भी कुछ मार्जिन छोड़ना चाहिए ताकि बात बिगड़ने जैसी नौबत ना आए। सर ने बड़े ही सहज अंदाज में गहरी बात समझा दी थी। उस दिन से गांठ बांध ली, कॉपी में मार्जिन छोड़ कर तो लिखना शुरु कर ही दिया। जिंदगी में अपनों से रिश्तों में प्रगाढ़ता बनी हुई है तो वही मार्जिन छोड़ने वाला गुरुमंत्र।

🔻कौशल सर ने स्कॉलरशिप दिलवाई।

मशिउमावि में जब पढ़ रहा था, विजय सिंह कौशल (जिनके पिता सीताराम कौशल स्वतंत्रता सेनानी थे, वो इंदौर समाचार में भी बैठा करते थे) हिंदी पढ़ाते थे।तब भी अजा, जजा वर्ग के छात्रों को स्कॉलर शिप मिलती थी।सर को पता था इसी वर्ग के एक छात्र को स्कॉलरशिप की जरूरत नहीं है। सर ने उसे यह लिख कर देने को राजी कर लिया कि उसे स्कॉलरशिप नहीं चाहिए।
बाद में कौशल सर ने स्कॉलरशिप के लिए मुझ से आवेदन लिखवाया और सिफारिश कर दी।सर ने प्रयास किए और मंजूरी भी हो गई। पहली स्कॉलरशिप की राशि से बिजली कनेक्शन ले लिया।अब स्विच दबाते ही घर में उजाला फैल जाता था, इससे पहले तक चिमनी और कंदील की रोशनी में या ओटले के समीप लगे खंबे पर जलती ट्यूब लाइट में पढ़ा करते थे।दूसरी बार यह राशि मिली तो बॉंबे रेडियो रानीपुरा से रेडियो खरीदा था। रेडियो सुनने का शौक ऐसा कि परीक्षा के दिनों में भी पढ़ते वक्त रेडियो सुनना जारी रहता था। रात में हवा महल या बाद में चलने वाले गीत सुनते सुनते नींद आ जाती तब भी रेडियो चलता रहता था। सभा समाप्ति के बाद खड़-खड़ की आवाज पर कमाजी (मां) आवाज लगाती मुन्ना रेडियो तो बंद कर दे।सर का कर्ज तो जीवन भर उतार नहीं सकता।शिक्षक दिवस पर एक बार में संगम नगर स्थित घर जा पहुंचा।सर सोए हुए थे, नींद से जागे, उन्हें कुछ देर तो मुझे पहचानने में लगा। याद दिलाया तो गले से लगा लिया। मैंने शाल-श्रीफल-चांदी का सिक्का-पुष्पमाला से उनका सम्मान कर चरणस्पर्श किया, उनकी आंखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी, अरे बेटा तूने मुझे याद रखा…!

🔻गुप्ता सर ने लगाया भाई की होटल पर ।

जब 30 नंबर स्कूल में पढ़ता था तब लोधीपुरा गली नंबर तीन निवासी एमसी गुप्ता सर ने क्लास के बच्चों को पढ़ाने के लिए सब्जी मंडी (सालवी बाखल) वाले हमारे घर को चुना।सेंटर पॉइंट होने से अन्य क्षेत्रों से आने वाले छात्रों को भी आसानी थी।गुप्ता सर हरि स्याही से लिखते थे, खूब सुंदर अक्षर थे उनके, उन्होंने सांई चालीसा भी लिखी, यह किताब मुफ्त में खूब बांटी। सट्टे के अंक वाली किताबों में प्रो गुप्ता के नाम से भाग्यांक भी लिखते थे।(लोधीपुरा में अब नहीं रहते हैं गुप्ता सर, कहां होंगे आज भी मेरी तलाश जारी है)

एक बार कहा कीर्ति मेरे भाई सीतलामाता बाजार में होटल शुरु कर रहे हैं।तुम सुबह वहां गल्ला संभाल लिया करो, आठ आने रोज मिल जाएंगे, दोपहर का स्कूल है तो परेशानी भी नहीं आएगी। पांचवी से आठवीं के दौरान सीतलामाता बाजार की उस होटल में दो चार दिन ही गल्ला संभाला। बाद में तो एक हाथ में केतली और दूसरे हाथ की पांचों अंगुलियों में दस कप फंसा कर ‘छोटू’ ठेले वालों, कपड़ा दुकानों आदि से आने वाली आवाज पर कट और फुल चाय पिलाने लग गया।बाद में गुप्ता सर के भाई महाराष्ट्र के किसी शहर में ससुराल जाकर बस गए। होटल किसी अन्य को बेच दी, कुछ समय अपन ने भी चाय-पोहे बनाए, बाद में छोड़ दी तो गुप्ता सर ने पंढरीनाथ मार्ग स्थित (आरआर) गुप्ता प्रिंटर्स पर झाडू-पोछे के काम पर लगा दिया। गुप्ता सर की सट्टे की भविष्यवाणी (भाग्यांक वाली) किताब यहीं छपती थी।यहां भी मिलते तो आठ आने रोज ही थे पर परिचितों द्वारा पूछने पर तनख्वाह पंद्रह रु महीना बताता था।ये गुप्ता परिवार सामने ही रेशमवाला लेन में ऊंचे ओटले वाले मकान में रहता था। आरआर गुप्ता के बड़े पुत्र दिनेश गुप्ता प्रेस संभालते थे, अब शायद किराना दुकान है उस जगह पर।

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