समाज में बढ़ती विकृति से रूबरू करा गया नाटक ‘पॉपकॉर्न’

  
Last Updated:  February 18, 2020 " 03:45 pm"

इंदौर : समाज में संस्कारों की गिरावट इस हद तक बढ़ गई है कि अच्छे चिंतन और अच्छा इंसान बनने- बनाने का सिलसिला थम सा गया है। संवेदनाए कहीं लुप्त होने लगी हैं। निराश्रित और मानसिक दिव्यांग महिलाओं को भी लोग वासना पूर्ति और टाइमपास करने का साधन समझने लगे हैं। समाज की ऐसी ही स्याह तस्वीर को पेश करता नाटक ‘पॉपकॉर्न’ हाल ही में बापट चौराहा स्थित कुंती माथुर सभागार में मंचित किया गया। संस्था पथिक के कलाकारों ने आशीष पाठक द्वारा लिखित इस नाटक को पेश किया। निर्देशन सतीश श्रोत्री का था।
नाटक के केंद्र में एक बेरोजगार पढा- लिखा युवक रूपक है जो सेना में भर्ती होने के लिए शहर जाता है। भर्ती प्रक्रिया के दौरान अव्यवस्था फैल जाने से भर्ती की तारीख एक माह आगे बढ़ा दी जाती है। इससे निराश रूपक घर लौटने की बजाय उसी शहर में रुकने का निर्णय लेता हैं।गरीबी और भुखमरी की हालत में रेलवे प्लेटफॉर्म पर उसकी मुलाकात एक बुजुर्ग से होती है जो उसे ट्रेन में पॉपकॉर्न बेचने की सलाह देता है। रूपक उसकी सलाह मानकर पेट भरने के लिए पॉपकॉर्न बेचना शुरू कर देता है। धीरे- धीरे उसे अच्छी कमाई होने लगती है। स्टेशन पर उसका परिचय समीप स्थित एक मंदिर के पंडित
और स्टेशन पर घूमनेवाली मानसिक दिव्यांग लड़की टुकिया से हो जाता है। टुकिया से रूपक को लगाव हो जाता है। वह रोज उसे पॉपकॉर्न खिलाता है। टुकिया भी पॉपकॉर्न खाने के लिए उसका इंतजार करती रहती। एक दिन स्टेशन पर फल बेचने वाले कि बुरी नजर मानसिक दिव्यांग टुकिया पर पड़ती है और वह उसे अपनी हवस का शिकार बना लेता है। स्टेशन पहुंचने पर रूपक को बदहवास हालत में इधर- उधर भागती टुकिया नजर आती है। उसकी हालत देखकर रूपक समझ जाता है कि उसके साथ बुरा काम हुआ है। इस बीच फलवाला वहां से भागने की कोशिश करता है तो रूपक उसे पकड़कर उसकी पिटाई करता है। हालांकि फलवाला खुद को छुड़ाकर भागने में सफल हो जाता है। टुकिया के साथ हुई घटना से दुःखी रूपक कहता है कि लोग टुकिया जैसी निराश्रित महिलाओं को टाइमपास पॉपकॉर्न समझ लेते है। आज से स्टेशन पर दो पॉपकॉर्न हैं एक वो खुद और दूसरी टुकिया। यहीं नाटक का पर्दा गिरता है।
यह नाटक उद्देश्य पूर्ण होने के साथ दर्शकों को झकझोर देता है। समाज में घट रही संवेदना और बढ़ती विकृति की ओर ध्यान खींचते हुए यह नाटक सोचने पर विवश करता है। सतीश श्रोत्री के कसावट भरे निर्देशन और कलाकारों की प्रभावी अदाकारी ने लोगों को अंत तक कुर्सी से चिपकाए रखा। नाटक में रूपक की केंद्रीय भूमिका शाकिर हुसैन ने निभाई। टुकिया के किरदार में राधिका देशमुख अपनी छाप छोड़ गई। इसके अलावा फलवाला- जितेंद्र खिलनानी, पंडित- सागर शेंडे, बुजुर्ग- दिलीप वनकर, राहगीर- डॉ निशिकांत कोचकर, लड़की- अनिष्का सोठिया और फौजी- रोहित कुर्मी ने अपने किरदार बेहतर ढंग से निभाए। स्वाति श्रोत्री की रंगमंच व्यवस्था, सम्यक जैन का संगीत और नंदकिशोर बर्वे का प्रकाश संयोजन नाटक के कथानक को उभारने में सहायक रहे।

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