कलेक्टर की माफी से खुश हो गए हों तो अब आत्मावलोकन भी कर लीजिए..

  
Last Updated:  May 8, 2021 " 06:50 pm"

🔺 कीर्ति राणा🔺

कलेक्टर इंदौर और हेल्थ अमले के बीच कोल्डवार मुखर होने के बाद शहर प्रभावित होने वाला था इससे पहले ही मान-सम्मान के जवालामुखी पर माफी की ठंडी चादर डाल कर कलेक्टर मनीष सिंह ने शहर हित की लड़ाई जीत ली है। ऐसा बहुत कम होता है कि कलेक्टर अपने मातहत अमले से माफी मांगे लेकिन महामारी सब करा सकती है। ये मान मर्यादा के खेल की डोर जिन भी हाथों में थी उन्हें और हेल्थ डिपार्टमेंट के लोग जो शहर की हेल्थ से खिलवाड़ करने का मन बना चुके थे, यदि वे सब कलेक्टर के माफी महोत्सव से खुश हो गए हैं तो अब उनके लिए भी मर्दानगी दिखाने का वक्त है। कलेक्टर की फटकार का इतना ही बुरा लगा है तो अब यह आत्मावलोकन भी कर लीजिए कि हेल्थ का अमला यदि पूरी मुस्तैदी से काम कर ही रहा था तो ये धूल झटकारने की नौबत आई ही क्यों? इस पूरे प्रकरण में इस तथ्य को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता कि जिस आईएएस का मेडिकल साइंस से वास्ता न हो उसे भी महामारी पर नियंत्रण के लिए इस महकमे के ज्ञान को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए। शहर की बेहतरी के लिए जब क्राइसेस मैनेजमेंट कमेटी बन सकती है तो सभी विभागों के मुखियाओं की राय जानने समझने के लिए अस्थायी कोर ग्रुप क्यों नहीं बन सकता।ऐसे हालात तब बनने लगते हैं जब जन की बात सुनने की अपेक्षा कलेक्टर भी मन की बात करने लगते हैं।एक चतुर-सजग या कहें शॉर्प आईएएस तो वह होता है जो अपने आसपास के वातावरण से भी सीख-समझ लेता है, पता नहीं फिर ये अधिकारी दो साल से चल रही इस महामारी और सत्ता शीर्ष की ढिलाई से भी क्यों नहीं सीख पाए।महाराष्ट्र के नंदुरबार में पदस्थ कलेक्टर डॉ राजेन्द्र भारुड़ ने जब आईएएस एग्जाम क्लियर की होगी तब शायद सिलेबस अलग रहा होगा।

खैर अपन तो मनीष सिंह विरुद्ध डॉ पूर्णिमा गडरिया व अदृश्य अन्यान्य मामले पर आ जाएं। हेल्थ अमले को याद नहीं रहा क्या, किसकी वजह से स्वच्छता के मामले में इंदौर देश में नंबर वन आया था-यही मनीष सिंह ही तो तब नगर निगम कमिश्नर थे।कोरोना पाश में जकड़ा शहर जब छटपटा रहा था तब शिवराज सिंह चौहान ने अपने प्रिय अधिकारी को सर्वथा उपयुक्त मान कर भेजा था तब इंदौर का शायद ही कोई विभाग-संगठन हो जिसने पलकपावड़े नहीं बिछाए हों उनके लिए।

फिर ऐसा क्या हुआ कि स्वास्थ्य अमले कि नजर में वही मनीष सिंह खलनायक हो गए।कलेक्टर के कंधों पर जब शहर को बचाने का दायित्व डाल कर सीएम और सीएस बेफिक्र हो जाएं तो मातहत विभागों को भी मान लेना चाहिए कि कोई भी कलेक्टर न तो जिले को मुसीबतों के महासागर में डूबने देगा और न ही अपनी सीआर खराब होने देगा । महामारी के ऐसे भीषण दौर में और वह भी इंदौर में ऐसा दबाव बनाना तब तो मुगालते में रहना ही है जब मुख्यमंत्री इंदौर को अपने सपनों का शहर मानते हों।सारे जन प्रतिनिधि जब हर निर्णय पर गर्दन हिलाना ही उचित समझते हों ऐसे में इस्तीफे, हड़ताल आदि की धमकी देने से पहले यह तो सोच ही लेना था कि व्यक्तिगत अहं या अपमान की लड़ाई में पूरे शहर को बलि का बकरा बनाना अनुचित ही माना जाएगा ।

अड़ियल रवैया अपनाने वालों को यह तो समझ ही लेना था कि सरकार को भी पल पल की खबर रहती है कि 52 जिलों की कमान जिन कलेक्टरों के जिम्मे सौप रखी हैं वो कितनी मुस्तैदी से चुनौती का सामना कर रहे हैं। हर दिन जब कलेक्टरों को नई चुनौती से जूझना पड़ रहा हो ऐसे में भी यदि यही सरकार महामारी के चलते कुछ जिलों के कलेक्टरों को बदलने का साहस दिखा सकती है और इंदौर में छेड़छाड़ करने की भी ना सोचे तो मनीष सिंह की हर एक्शन को मुख्य सचिव भी इंदौर के लिए बेस्ट सिलेक्शन मान रहे हैं।

माना कि मनीष सिंह की सरकार को खुश रखने की ‘कला’ सुपर-डुपर हैं लेकिन सरकारें भी कम निर्मम नहीं होतीं, जब योजनाओं की विफलता उजागर होने लगती है तो कमिश्नर-कलेक्टर ही निशाने पर रहते हैं, जैसे जिले में कलेक्टर के निशाने पर मातहत अधिकारी। नंबर वन का खिताब दिलाने वाले मनीष सिंह ने क्या निगम अमले के साथ रंग-गुलाल खेलकर ही (2016 में) यह खिताब झपट लिया था।जिस अमले ने निगमायुक्त के हर आदेश का जी जान से पालन किया वह तो इस्तीफे का दबाव बनाए बिना सरकार को झुकाने में आज भी उतना ही सक्षम है और रहेगा।

अस्पतालों में अनाप-शनाप बिल वसूली, धारा 144 लगाने के बाद भी कई मामलों में सख्ती न दिखाने को कलेक्टर की कमजोरी समझने वाले यह भूल गए कि शहर हित पहली प्राथमिकता होने से कई तरह के समझौते करना इसलिए जरूरी हो जाता है कि एकसाथ कई मोर्चों पर कोई भी समझदार अधिकारी लड़ाई नहीं लड़ना चाहेगा।

शहर के सम्मान से ज्यादा अपने मान सम्मान के अहंकार के झाड़ पर चढ़े समझदारों को यह उम्मीद तो कतई नहीं रही होगी कि बैठकों में रौद्र अवतार वाले कलेक्टर माफी की आरी चला देंगे। एक तरह से यह सुखद पटाक्षेप शहर के हित में हुआ है वरना ऑक्सीजन, बेड, इंजेक्शन के लिए दिन की शुरुआत मारामारी से करने वाले आम जन को ही इस अंहकार का शिकार होना पड़ता।इस्तीफे का दबाव बनाने वाली अधिकारी के कंधे को इस्तेमाल कर के निशाना लगाने वाला मेडिकल माफिया भी ‘मिस फायर’ हो जाने से आक्सीजन के अभाव वाले मरीज की तरह छटपटा रहा होगा।

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