मनोरंजन के नित नए माध्यमों के बीच जारी है रंगमंच की ‘शोभायात्रा’

  
Last Updated:  March 30, 2021 " 04:57 am"

इंदौर : दो दिन पूर्व विश्व रंगमंच दिवस मनाया गया। कोरोना के बढ़ते प्रकोप के चलते कोई प्रत्यक्ष आयोजन तो नहीं हुए लेकिन रंगमंच के भूत, वर्तमान और भविष्य को लेकर ऑनलाइन चर्चाएं बहुत हुई। ये सही है कि सिनेमा और टीवी के बाद सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफार्म सहित कई माध्यम सामने आने से रंगमंच के अस्तित्व को बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गई है रही- सही कसर कोरोना ने पूरी कर दी है। बावजूद इसके रंगमंच की अहमियत को नकारा नहीं जा सकता। ये वो लाइव माध्यम है जहां रीटेक की कोई गुंजाइश नहीं होती। नाटक अच्छा है, कलाकारों का अभिनय व तालमेल बेहतर है और निर्देशकीय पकड़ कसावट भरी है तो दर्शकों का रिस्पॉन्स त्वरित मिलता है। उनकी तालियों की गूंज बता देती है कि नाटक उनके दिल को छू रहा है।
बहरहाल, बात करें करीब एक- डेढ़ माह पूर्व की तो उससमय कोरोना के मामले काफी कम हो गए थे, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियां परवान चढ़ने लगी थीं। उसी दौरान कोरोना गाइडलाइन का पालन करते हुए नाट्य संस्था ‘पथिक’ के बैनर तले रवींद्र नाट्यगृह में शफ़ाअत खान लिखित नाटक ‘शोभायात्रा’ का मंचन किया गया। स्व. डॉ. मनोहर मोतीवाले की स्मृति को समर्पित इस नाटक का निर्देशन सतीश श्रोत्री ने किया। स्वतंत्रता संग्राम के आसपास की घटनाओं के साथ वर्तमान परिदृश्य को जोड़ते हुए खेले गए इस नाटक के जरिए यह रेखांकित करने की कोशिश की गई कि महापुरुषों का चोला पहन भर लेने से कोई उनके जैसा नहीं बन जाता। उसकी आदतें, आचार, विचार और व्यवहार नहीं बदलते। नाटक में गांधी और सुभाषचंद्र बोस के वैचारिक मतभेद, गांधी हत्या के बाद महाराष्ट्र में निर्दोष ब्राह्मणों पर किए गए अत्याचार, नेहरूजी के हाथों हुई गलतियों सहित कई ऐसे बिंदुओं को छुआ गया जो दर्शकों को सोचने पर विवश करते हैं। बिना मध्यांतर के लगभग डेढ़ घंटे के इस नाटक में स्वतंत्रता के बाद राजनीति में आई गिरावट, अपराधियों का राजनीति में दखल और उनके वर्चस्व को भी शिद्धत से पेश किया गया। महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, नेहरू, झांसी की रानी और लोकमान्य तिलक के किरदारों के जरिए भूत और वर्तमान की पड़ताल करनेवाले इस नाटक के माध्यम से हकीकत को सामने रखने की कोशिश निर्देशक और कलाकारों ने बखूबी की। नाटक के लेखक की मंशा को मंच पर उभारने में कलाकार सफल रहे। गांधी के किरदार में अनुराग मिश्र ने सर्वाधिक प्रभावित किया। झांसी की रानी- शुभदा केकरे, लोकमान्य तिलक- अभिजीत निमगांवकर, सुभाषचंद्र बोस- नंदकिशोर बर्वे, जवाहरलाल नेहरू- मिलिंद शर्मा, बाबू गेनू- डॉ. पंकज उपाध्याय, पावलस- संजय पांडे, छोटू- अद्वैत केकरे, बार्बी- दिव्या मेहरा और दंगाई की भूमिका राहुल प्रजापति व राहुल दीपके ने निभाई। मंच के पीछे रहकर जिन्होंने नाटक को कामयाब बनाने में योगदान दिया उनमें रंगमंच व्यवस्था- सागर शेंडे व प्रकाश अग्निहोत्री, संगीत- रोशनी दीपके, रँगभूषा- सतीश श्रोत्री, प्रकाश व्यवस्था- तपन शर्मा, वेशभूषा- स्वाति श्रोत्री और प्रबंधन- शेखर मुंगी प्रमुख थे।
सोचने पर विवश करने वाले इस नाटक को देखने सैकड़ों लोग मौजूद थे। दर्शकों की जैसी उपस्थिति उस दिन नाटक देखने के लिए रवींद्र नाट्यगृह में नजर आई उससे एक बात तो तय है कि मनोरंजन के कितने भी साधन क्यों आ जाएं, रंगमंच का विकल्प नहीं बन सकता। नाटक देखने वालों का अपना विशिष्ट वर्ग है और वो हमेशा रहेगा।

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