महाकाल लोक में हुए घोटाले की हाईकोर्ट के जज से करवाएं जांच

  
Last Updated:  June 4, 2023 " 03:22 pm"

कांग्रेस ने की मांग।

शिवराज सरकार पर लगाया महाघोटाले में लिप्त होने का आरोप।

इंदौर : कांग्रेस ने बीते दिनों उज्जैन में चली आंधी के दौरान महाकाल लोक में हुए नुकसान को बड़ा घोटाला बताते हुए इसकी उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनका आरोप है कि महाकाल लोक घोटाला शिवराज सरकार का सबसे बड़ा पाप है। कांग्रेस ने अपने आरोप के समर्थन में कई तथ्य पेश कर उनके प्रमाणित होने का दावा भी पेश किया है।

महाकाल लोक में हुये घोटालों के लेकर तथ्य इस प्रकार हैं:-

 दिनांक 4 सितम्बर 2018 को निविदा क्रमांक 52/ यूएससीएल/ 1819 तत्कालीन शिवराज सरकार ने योजना बनायी, जिसकी अनुमानित लागत 97 करोड़ 71 लाख रूपये थी।

कमलनाथ सरकार के आने के बाद कमलनाथ ने इस राशि को अपर्याप्त मानते हुए इस राशि को बढ़ाकर 300 करोड़ रू. स्वीकृत किये। कार्यादेश 7 मार्च 2019 को कांग्रेस सरकार द्वारा जारी किया गया।

एफआरपी की प्रतिमाओं की मजबूती हेतु आंतरिक लोहे का ढांचा बनाया जाता है, जो महाकाल लोक की प्रतिमाओं में नहीं बनाया गया। प्रतिमाओं के निर्माण में उपयोग की जाने वाली नेट की मोटायी 1200 से 1600 ग्राम जीएसएम की होना चाहिए, किंतु महाकाल लोक में स्थापित की गई प्रतिमाओं में 150 से 200 ग्राम जीएसएम की ही चाईनीज नेट उपयोग की गई।
 प्रतिमाओं को बिना बेस (फाउंडेशन) के 10 फीट ऊंचे पेडस्टल पर सीमेंट से जोड़ा गया। इसी कारण 30 किलोमीटर प्रतिघंटे की हल्की रफ्तार से चली हवा में ही प्रतिमाएं गिरकर क्षतिग्रस्त हो गईं।

निविदा की शर्त क्रमांक 2 जो कि पृष्ठ क्रमांक 107 पर अंकित है, में स्पष्ट निर्देश हैं कि मूर्तियों की गुणवत्ता की जांच हेतु कार्यस्थल पर ही प्रयोगशाला स्थापित करनी होगी, जो नहीं की गई। यदि इस्तेमाल की जाने वाली सामग्रियों का परीक्षण प्रयोगशाला में किया जाता तो न प्रतिमाएं गिरती और न ही खंडित होतीं।

मूर्तियों के इतने कम समय में बदरंग होने की बजह निविदा शर्त के अनुसार मूर्तियों की घिसाई न होना और प्रायमर तथा बेदरप्रूफ पीयू रंग का पर्याप्त इस्तेमाल न होना है। मूर्तियों में जब साधारण रंग लगाया जाता है तभी वे बदरंग होती हैं। अब सवाल यह उठता है कि 24 नवम्बर 2022 के टेंडर के माध्यम से खरीदी गई सामग्री कहां गई। उसका उपयोग क्यों और किसलिए नहीं हुआ और क्या उक्त टेंडर के माध्यम से कागजी खरीदी की गई, यह जांच का विषय है।

उज्जैन शहर में ही एक ही तरह की एक ही ठेकेदार द्वारा लगायी गई मूर्तियों के निर्माण की लागत में व्यापक अंतर सामने आया है। उज्जैन के स्थानीय सिंधी समाज द्वारा 25 फीट ऊंची मूर्ति का निर्माण 4 लाख 11 हजार रू. में करवाया गया। जबकि महाकाल लोक में 15 फीट ऊंची प्रतिमा का भुगतान 10 लाख 2 हजार रू. किया गया। साधारण गणित के आधार पर 15 फीट ऊंची प्रतिमा की कीमत अधिकतम 3 लाख रू. होना चाहिए।

कार्यादेश की शर्त क्रमांक 2 के अनुसार प्रतिमाओं की डीएलपी (डिफेक्ट लायवेंटी पीरीयड) तीन वर्ष होने के कारण क्षतिग्रस्त मूर्तियों को महाकाल लोक के एक कौने में रिपेयर किया जा रहा है। जबकि खंडित मूर्तियों को धर्मक्षेत्र में स्थापित करना वर्जित माना जाता है।

उज्जैन कलेक्टर द्वारा पांच-सात दिनों में ही मूर्तियों की पुर्नस्थापना की घोषणा की गई, जिससे स्पष्ट है कि खंडित मूर्तियों को ही जोड़तोड़ कर पुर्नः स्थापित किया जाएगा।

महाकाल लोक के लोक की भव्यता जिसे कमलनाथ आध्यामिक पर्यटन का वैश्विक केंद्र बनाना चाहते थे, की आड़ में वर्तमान भाजपा सरकार ने दर्शनार्थियों से कई प्रकार के शुल्क वसूलकर महाकाल मंदिर में ही अव्यवस्थाओं का बोलवाला कर दिया है। आम श्रद्धालु जिससे अपने आप को ठगा महसूस करता है।

हमारा स्पष्ट कहना है कि पूर्व सीएम कमलनाथ की मांग के अनुसार हाईकोर्ट के किसी वर्तमान न्यायाधीश से महाकाल लोक घोटाले की उच्च स्तरीय जांच करायी जाए ताकि घोटालेबाजों को दंड दिया जा सके और सनातन धर्म को मानने वाले प्रदेश के जनमानस की आस्था को पहुंची चोट पर मरहम लगाया जा सके।

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