रहे न रहे हम….महका करेंगे…

  
Last Updated:  February 7, 2022 " 09:34 pm"

लता जी का जाना एक युग का अवसान है। वह लता जी जो सुरों का संज्ञान थी, भारत की पहचान थी। वे तो अपने मधुर स्वर से हर गीत में स्वयं ही अमर हो गई। वे एक ऐसी सुरों की मलिका थी जिनके तराने युगों-युगो तक लोगों को गुनगुनाने और झूमने पर विवश कर देंगे। यह कैसा निष्ठुर बसंत था जो जीवन में बहार का स्वर देने वाली अनूठी कोकिला को ही मौन देकर चला गया। उनकी असीम सुर साधना की क्षमता तो आवाज के जादू से शब्दो के लौह कण को कुन्दन में सृजित और परिवर्तित करने का अनोखा जादू रखती थी। उनके बोल अनायास ही अधरों पर नाचने लगते थे। नश्वर शरीर का अंत तो निश्चित है, पर लताजी के स्वर से सजा स्वर्णिम युग सदैव जीवंत रहेगा। उनका स्वर पूरी दुनिया के संगीत प्रेमियों को मंत्रमुग्ध करने की क्षमता से परिपूरित था। उनकी स्वर लहरें दशको तक प्रशंसकों के दिल में हिलौरे लेती रहेंगी।
नियति का नियामक चक्र देखिए जिस सुर साम्राज्ञी पर माँ शारदे की असीम कृपा थी, वह उन्हीं के साथ विदा हो गई। अपने अनूठे स्वर में लगभग 50 हजार से भी ज्यादा गीत उन्होंने गाए। उनकी संगीत साधना भारत रत्न, पद्मविभूषण, दादा साहेब फाल्के अवार्ड और कई उन्नत उपलब्धियों से अलंकृत हुई। लताजी तो वाग्देवी की वो सच्ची आराधक थी जो अनुपम नगमों के साथ सदा गुनगुनाई जाएंगी। सरस्वती की कृपा अनुरूप कई सदियों में शायद एक लताजी पैदा होती हैं जो जनमानस के हृदय को अपनी सुर साधना से तरंगित करने की असीम क्षमता रखती हैं। उनके मर्म को स्पर्श कर सकती है, छू सकती है। लताजी का सफर 1929 से 2022 का वो यादगार सफर है जो लोगों के दिलों में घर बना गया। उनकी आवाज ने दिलों की गहराइयों में एक अमिट छाप छोड़ दी।उनके जैसी अद्भुत प्रतिभा का अवतरण तो सच में ईश्वरीय आशीर्वाद है। जब भी उनके स्वर कानों में गूँजेंगे हम उनका अमरत्व उन्हीं स्वरों के माध्यम से स्पर्श कर लेंगे। मिट्टी का शरीर ही तो मिट्टी में विलीन हुआ है पर वे स्वर के ज्योतिपुंज से अमरत्व की ऊँची सीढ़ियों को छु चुकी हैं और सदैव सिरमौर कहलाएंगी।

संगीत के वटवृक्ष को अपने स्वर प्रेम से लता जी ने ही तो सींचा था। कला की अनूठी साधना में संगीत जगत में उनके स्वर की अपूरणीय क्षति को कोई भी पूरा नहीं कर पाएगा। मधुर कंठ की महारानी चिरनिद्रा में जरूर चली गई पर अपने स्वर का आशीर्वाद देकर हमें उल्लासित और झूमता हुआ छोड़ गई। इंदौर में जन्मी पंडित दीनानाथ मंगेशकर और शेवन्ती की लाड़ली ने फिल्मी गीतों को अपनी आवाज का जादू दिया। उनकी इसी आवाज ने कई फिल्मों को लोकप्रियता के आयाम दिए। संगीत की स्वामिनी सादगी और सौम्यता की मूर्ति सरस्वती की अनवरत साधना में लीन साधिका अपने हृदय स्पर्शी गीतों के साथ उम्र के बंधनों को पीछे छोडते हुए पुरानी और नई दोनों दौर की अदाकाराओं की सफल आवाज बनी। इस यशस्वी स्वर कोकिला का यूं खामोश होना हर इंसान के मन को आहत कर गया पर उनके सँजोए अमूल्य संगीत की धरोहर का खजाना हमारी आने वाली पीढ़ियों के पास भी सुरक्षित है। उनके जाने से नैनों में अश्कों की लड़ियाँ जरुर हैं पर उनके स्वर की गूँज सारी फिज़ाओं को महका रही है और जीवन को बसंत के नए आयाम दे रही है। ईश्वर की रचित सृष्टि के पंचतत्व में विलीन स्वर कोकिला को सजल नेत्रों से श्रद्धांजलि। वे अपने अनूठे स्वर की धरोहर से हमारे स्मृतिपटल पर सदैव जीवंत रहेंगी।

डॉ. रीना रवि मालपानी (कवयित्री एवं लेखिका)

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