शून्य में समा गया कारपोरेट पत्रकारिता का शिखर
🔺कीर्ति राणा🔺 प्रकाश बियाणी जी को याद करता हूं तो दैनिक भास्कर इंदौर के वो दिन याद आ जाते हैं…वो पहली मंजिल पर बैठते थे…तब कंप्यूटर रूम में अपनी लिखी कॉपी देने जाते तो हेलो-हाय हो जाती थी। कहा जाए तो तब वो कॉरपोरेट घरानों से जुड़ी छोटी-छोटी खबरें लिखते थे। जैसे जैसे भास्कर कॉरपोरेट कल्चर में ढलता गया, उनकी शून्य से शुरुआत जैसी कॉरपोरेट वाली पत्रकारिता भी शिखर छूने लगी और बीते एक-दो दशक में ऐसा बदलाव आया कि और पढ़े










