गड्ढेदार सड़कों, गंदगी, कीचड़, ड्रेनेज सिस्टम के अभाव से नागरिक परेशान।
इंदौर : देश का सबसे स्वच्छ शहर, इंदौर, जो आठ बार लगातार स्वच्छता सर्वेक्षण में शीर्ष स्थान हासिल कर चुका है, बदहाल सड़कों के मामले में बदनाम हो रहा है। तुलसी नगर कॉलोनी, जो 2014 में इंदौर नगर निगम की सीमा में शामिल हुई थी, गड्ढों, कीचड़ और उपेक्षा की मार झेल रही है। 11 साल बीत गए, लेकिन तुलसी नगर के निवासियों का सपना—पक्की सड़कें, साफ-सुथरा ड्रेनेज सिस्टम—आज भी अधूरा है। बारिश का मौसम आते ही यह कॉलोनी तालाब में तब्दील हो जाती है, और रहवासियों का जीवन मुश्किलों के दलदल में फंस जाता है।
उपेक्षा की मार, टूटे सपनों की कहानी।
तुलसी नगर को 2014 में नगर निगम में शामिल तो किया गया, लेकिन इसे वैध से अवैध घोषित कर इसके विकास को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। निवासियों ने सालों तक संपत्ति कर, जल कर और अन्य सभी करों का भुगतान किया, लेकिन बदले में उन्हें सिर्फ टूटी-फूटी सड़कें, गंदगी ही मिली। वर्ष 2023 में लंबे संघर्ष के बाद कॉलोनी के 2400 में से 540 प्लॉटों को वैध करार दिया गया। अखबारों में विकास के बड़े-बड़े वादों के विज्ञापन छपे, लेकिन डेढ़ साल बाद भी तुलसी नगर की सड़कें गड्ढों और कीचड़ से भरी हैं। बारिश का पानी सड़कों पर जमा है, जिससे न केवल आवागमन बल्कि जीवन जीना भी दूभर हो गया है।
“हमारी सुनता कौन है?” निवासियों का आक्रोश और दर्द।”
तुलसी नगर की निवासी शारदा सिंह परिहार का कहना है, “तुलसी नगर की हालत बद से बदतर है। हमने अपने बच्चों का भविष्य संवारने के लिए इस कॉलोनी में घर बनाए, लेकिन बदहाल सड़कें और गंदगी हमारी उम्मीदों को कुचल रही हैं।” एक अन्य निवासी, रमेश यादव, गुस्से में कहते हैं, “हम 11 साल से हर कर चुकाते आ रहे हैं, लेकिन बदले में हमें क्या मिला? गड्ढों में डूबी सड़कें, मच्छरों का अड्डा और बीमारियां। क्या यही है स्वच्छ भारत का मॉडल शहर?”
सरिता देवी बताती हैं, “मेरे बच्चे कीचड़ और पानी से भरी सड़कों पर गिरते-पड़ते स्कूल जाते हैं। कई बार तो उनकी किताबें और कपड़े खराब हो जाते हैं। हमने नगर निगम में बार-बार शिकायत की, लेकिन सिर्फ आश्वासन मिले, हल कोई नहीं।”
तुलसी नगर की मुख्य सड़क, जो कॉलोनी को शहर से जोड़ती है, गहरे गड्ढों और उखड़ी सतह के कारण अब जानलेवा बन चुकी है। ड्रेनेज सिस्टम का अभाव इस दुख को और गहरा करता है। बारिश का पानी सड़कों पर जमा होकर बदबू और मच्छरों का घर बन गया है, जिससे डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।
“अब और बर्दाश्त नहीं” – निवासियों की मांग और चेतावनी।”
वार्ड 36_37 रहवासी महासंघ के संरक्षक के.के. झा, अध्यक्ष राजेश तोमर, तुलसी सरस्वती सोशल वेलफेयर सोसाइटी के शंभूनाथ सिंह और संजय यादव ने एक स्वर में कहा, “इंदौर नगर निगम को तुलसी नगर की उपेक्षा बंद करनी होगी। स्वच्छता के साथ-साथ सड़क और ड्रेनेज जैसी बुनियादी सुविधाएं भी शहर की शान हैं।” निवासियों ने मांग की है कि नगर निगम तत्काल सड़कों और ड्रेनेज सिस्टम के पुनर्निर्माण के लिए कदम उठाए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगें अनसुनी रहीं, तो वे सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे।
पार्षद का आश्वासन, लेकिन क्या बदलेगा?
स्थानीय पार्षद संगीता महेश जोशी ने तुलसी नगर की दयनीय स्थिति को स्वीकार करते हुए कहा, “हम इस समस्या को गंभीरता से ले रहे हैं। तुलसी नगर की सड़कों और ड्रेनेज लाइन के लिए नगर निगम से फंड की मांग की जाएगी, ताकि जल्द से जल्द आधारभूत ढांचे का विकास हो सके।” लेकिन निवासियों का कहना है कि आश्वासनों का दौर अब खत्म होना चाहिए।
तुलसी नगर के निवासियों का दर्द अब केवल सड़कों और ड्रेनेज तक सीमित नहीं है; यह उनके टूटे सपनों, अनसुनी शिकायतों और उपेक्षा की कहानी है। स्वच्छता के तमगे पर गर्व करने वाला इंदौर क्या तुलसी नगर को भी अपनी चमक का हिस्सा बनाएगा? या फिर यह कॉलोनी हमेशा पूछती रहेगी—”मैं तुलसी किसके आंगन की?”








