लालबाग परिसर में उतर आया जनजातीय परिवेश

  
Last Updated:  February 11, 2023 " 08:57 pm"

जनजातीय फ़ूड फेस्टिवल और जड़ी-बूटी मेला प्रारंभ।

जनजातीय रहन-सहन से लेकर खानपान, उत्पाद, आभूषण, जड़ी-बूटी और इलाज, सब कुछ हाजिर है मेले में।

इंदौर : लालबाग के विशाल परिसर में शनिवार से नौ दिनी जनजातीय फ़ूड फेस्टिवल और जड़ी-मेले का शुभारंभ हुआ। इस मेले के तहत जैसे पूरा जनजातीय गांव लालबाग परिसर में बसा दिया गया है। शनिवार को संस्कृति मंत्री उषा ठाकुर, जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट, वन मंत्री विजय शाह और अन्य अतिथियों ने इस मेले का औपचारिक शुभारंभ किया।

मेले में नजर आता है जनजातीय परिवेश।

श्री नारायण मानव उत्थान समिति द्वारा आयोजित इस मेले के संयोजक पुष्पेंद्र चौहान और बलराम वर्मा ने बताया कि मेले में साढ़े चार सौ से ज्यादा स्टॉल लगे हैं। मेले को कुछ इस तरह से प्लान किया गया है कि यहां आने वाले दर्शकों को जनजातीय जीवन से जुड़ी हर बात और माहौल को देखने और महसूस करने का मौका मिलेगा। अलीराजपुर से आई साक्षी भयड़िया और उनकी टीम ने यहां बांस और टाट से निर्मित एक हूबहू वैसी झोपड़ी और आंगन तैयार किया है, जिसमें जनजातीय क्षेत्रों के लोग रहते हैं। इसके आंगन में एक सुंदर पूजा क्षेत्र भी है, जिसमें मिट्टी के घोड़े और अन्य कलाकृतियां रखी हैं। साक्षी बताती हैं कि जनजातीय क्षेत्रों में रहने वाले लोग अपने देवता को प्रसन्न रखने के लिए उन्हें मिट्टी का घोड़ा भेंट करते हैं। यही नहीं, इस घर की एक दीवार पर गोफन, फालिया और धनुष-बाण जैसे हथियार सलीके से टंगे मिलते हैं जिनका उपयोग जनजातीय लोग अभी भी करते हैं। उधर, घर के भीतर अनेक प्रकार और आकार के मिट्टी के बर्तन भी मौजूद मिलते हैं, जिनमें जनजातीय घरों में भोजन पकाया जाता है।

मिट्टी व गोबर की झोपड़ियों में बैठकर उठा सकेंगे जनजातीय व्यंजनों का लुत्फ।

चौहान और वर्मा ने बताया कि इस घर के पास में मिट्टी व गोबर से लीपकर चार बड़ी जनजातीय क्षेत्रों जैसी झोपड़ियां बनाई गई हैं और यहां पर जनजातीय क्षेत्र के घर की महक और माहौल का अहसास हुए बिना नहीं रहता। मेले में आनेवाले लोग इसी माहौल में इन झोपड़ियों में बैठकर जनजातीय व्यंजनों का लुत्फ ले सकेंगे। यहां दाल-पानिये, मक्का की रोटी, ज्वार की रोटी, मटूरिया और पत्थर पर पिसी स्वादिष्ट चटनी सहित अनेक जनजातीय व्यंजनों का स्वाद लिया जा सकेगा। इसके सामने एक झूला जोन भी है, जहां दर्शक अनेक प्रकार के झूलों का आनंद ले सकेंगे।

प्रतिदिन शाम को होंगे जनजातीय सांस्कृतिक कार्यक्रम।

मेला संयोजक चौहान और वर्मा ने बताया कि दर्शकों को जनजातीय जीवन, संस्कृति और संस्कारों से परिचित कराने के लिए मेले में रोज शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होंगे।

दुर्लभ जड़ी – बूटियों के लगाए गए हैं स्टॉल।

इसी के साथ जनजातीय क्षेत्रों में पाई जाने वाली दुर्लभ जड़ी-बूटियों के सौ से ज्यादा स्टॉल भी मेले में लगाए गए हैं, जहां लोग ऐसी करीब डेढ़ हजार जड़ी-बूटियों को देख सकेंगे और उनके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकेंगे। इसी के साथ मेले में एक मेडिकल जोन भी तैयार किया गया है, जहां विशेषज्ञ वैद्य और डॉक्टर्स युवा स्वास्थ्य, कैंसर, जटिल वात रोग, शिशु रोग व अन्य बीमारियों के उपचार हेतु निःशुल्क दवाई और परामर्श प्रदान करेंगे। जबलपुर से मशहूर वैद्य संतोष आनंद जायसवाल भी यहां आए हैं, जो पक्षाघात और मिर्गी सहित 50 से अधिक असाध्य रोगों का इन चमत्कारी जड़ी-बूटियों से सफल उपचार करने के लिए खास जाने जाते हैं।

चौहान और वर्मा ने बताया कि एकता मेहता द्वारा गोबर और मिट्टी से निर्मित अनेक आकर्षक जनजातीय आभूषण भी मेले का विशेष आकर्षण हैं। दर्शकों को इनको बनाने की विधि व अन्य बारीकियां भी यहां सीखने-समझने को मिलेंगी। इसी तरह मानसी नाडकर जनजातीय ज्वेलरी बनाने की ट्रेनिंग देंगी। मेले में फ़िल्म फवेस्टिवल भी होगा, जिसमें अखिल शर्मा और मलय वर्मा की शार्ट फिल्में दर्शकों को देखने को मिलेंगी। मेले में रोज शाम 7 बजे से स्वास्थ्य को लेकर हृदय, एलर्जी आदि विभिन्न रोगों के विशेषज्ञ वैद्यों और चिकित्सकों के व्याख्यान होंगे।

पुष्पेंद्र चौहान और बलराम वर्मा ने बताया मेले के पहले दिन हजारों की तादाद में महिला-पुरुष और युवाओं ने इस जनजातीय संस्कृति से जुड़े आयोजन को खूब उत्सुकता और आनंद से निहारा। मेला 19 फरवरी तक प्रतिदिन सुबह 11 बजे से लेकर रात 10 बजे तक सभी के लिए खुला रहेगा।

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