लाखों लोगों के बलिदान का परिणाम है अयोध्या का श्रीराम मंदिर

  
Last Updated:  February 18, 2024 " 06:00 pm"

सामाजिक समरसता से ही राम राज्य का निर्माण संभव।

त्वरित न्याय के लिए न्यायिक व्यवस्था में सुधार की जरूरत।

धर्म ही समाज और राष्ट्र का आधार।

मंदिर आर्थिक तंत्र को मजबूत करते हैं।

नर्मदा साहित्य मंथन के दूसरे दिन विभिन्न सत्रों में वक्ताओं ने रखे विचार।

हेरिटेज वॉक का भी हुआ आयोजन।

इंदौर : नर्मदा साहित्य मंथन के तृतीय सोपान के दूसरे दिन का प्रारंभ हेरिटेज़ वॉक से हुआ। भोजशाला से प्रारंभ हुई हेरिटेज वॉक का समापन विजय मंदिर पर किया गया। हेरिटेज वॉक मे विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार,पाँचजन्य के संपादक हितेश शंकर एवं सर्वोच्च न्यायालय के प्रसिद्ध वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय प्रमुख रूप से शामिल हुए।

लाखों लोगों के बलिदान का परिणाम है अयोध्या का श्रीराम मंदिर।

नर्मदा साहित्य मंथन के दूसरे दिन का प्रथम सत्र रामराज्य की अवधारणा एवं स्वरूप विषय पर केंद्रित रहा जिसमें विहिप के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम का मंदिर 25 पीढ़ियों और लाखों लोगो के बलिदान का परिणाम है। इस वर्ष 22 जनवरी को दुनिया के 55 देशों के 5 लाख मंदिर में 9 करोड़ से अधिक लोगो ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का उत्सव मनाया। भारत के करोड़ों लोगों की श्रद्धा ने मूर्ति में प्राण स्थापित किए। उन्होंने कहा कि रामजी के राज्य में धर्म आधारित जीवन था। समाज के संबंधों का निर्धारण पुलिस और क़ानून नहीं कर सकता। आतंकवाद और सभ्य समाज एक साथ नहीं रह सकते हैं। राम राज्य में महिला सम्मान के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा , सहभाग और सम्मान ये सभी राम राज्य में भी थे। वर्तमान में इसके बिना हम विश्वगुरु नहीं हो सकते। अयोध्या में राम मंदिर की स्थापना आदिपर्व था परंतु भविष्य में ऐसे अवसर आते रहेंगे। आने वाले समय में मथुरा, काशी और भोजशाला भी अपने मूल स्वरूप में स्थापित होगी। इस चर्चा सत्र का संचालन सिद्धार्थ शंकर गौतम ने किया।

सामाजिक समरसता से ही राम राज्य का निर्माण संभव है।

द्वितीय सत्र में पद्मश्री रमेश पतंगे ने संविधान से राम राज्य का मार्ग विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि संविधान केवल पुस्तक में पढ़ने से आगे बढ़कर दैनिक जीवन में जीना पड़ेगा। सामाजिक समरसता का उल्लेख संविधान में मिलता हैं। उन्होंने कहा कि जब तक समाज में सामाजिक समरसता का भाव नहीं होगा, समाज में राम राज्य का निर्माण नहीं हो सकता।हमारे संविधान में भी सामाजिक समरसता को सर्वोपरि रखा गया है। सत्र का संचालन सुब्रतों गुहा ने किया।

समय पर न्याय मिले यह सुनिश्चित हो।

तृतीय सत्र के मुख्य वक्ता सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय थे। उन्होंने भारतीय न्यायपालिका में स्व की अवधारणा विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने भारत की स्व आधारित न्याय व्यवस्था की स्थापना के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत में अभी ग़ुलामी की मानसिकता वाली शिक्षण व्यवस्था, न्याय व्यवस्था, पुलिस व्यवस्था एवं कार्यपालिका चल रही हैं इसे बदलने की आवश्यकता हैं। न्याय यदि समय पर नहीं मिलता तो वो किसी काम का नहीं हैं।उन्होंने कहा कि भारत में एक साल में न्याय वाली व्यवस्था लागू होना चाहिए। उन्होंने कहा कि क़ानून कठोर होने से लोग अपराध नहीं करेंगे।

त्वरित न्याय के लिए न्याय व्यवस्था में सुधार की जरूरत।

उन्होंने कहा कि त्वरित न्याय के लिए ज्यूडीशियल रिफार्म की आवश्यकता हैं। जज़ों की नियुक्ति के लिए भी राष्ट्रीय स्तर की एक परीक्षा होनी चाहिए। इस सत्र का संचालन विशाल सनोठिया ने किया।

धर्म ही समाज और राष्ट्र का आधार है।

चतुर्थ सत्र में विवेकानंद केंद्र की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद्मश्री निवेदिता रघुनाथ भिड़े ने दैनिक जीवन में अध्यात्म विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत अध्यात्म का केंद्र रहा हैं। अध्यात्म के कारण ही भारत वैभव संपन्न राष्ट्र रहा हैं। धर्म ही राष्ट्र और समाज का आधार है। धर्म में हम सबके कर्तव्य निहित हैं, व्यक्तिवादी होने से सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाएगा और परिवार का विघटन होता हैं। समाज के प्रति निःस्वार्थ भाव ही राष्ट्र के पुनरुत्थान का माध्यम बनेगा।

मंदिर आर्थिक तंत्र के साथ पर्यावरण को भी मजबूत करते हैं।

पाँचजन्य के संपादक हितेश शंकर ने पाँचवे सत्र में मंदिरों से मज़बूत होता भारत का आर्थिक तंत्र विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहाँ कि आपदा के समय मंदिर ना सिर्फ़ संबल प्रदान करते हैं बल्कि संसाधन भी प्रदान करते हैं। इसका उदाहरण कोविड में देखने को मिला। देश भर के हज़ारों मंदिरों ने करोड़ों लोगो को भोजन और आश्रय प्रदान किया।
मंदिर आर्थिक तंत्र के साथ पर्यावरण को भी मज़बूत करते हैं। कार्बन क्रेडिट बढ़ाने के लिए मंदिर क्षेत्र के वन एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मंदिर और समाज एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों एक दूसरे का संरक्षण करते हैं। मंदिर की प्रसाद परंपरा समाज के पोषण का एक माध्यम हैं। हमारे मंदिर आर्थिक तंत्र को मजबूत करने का एक सशक्त माध्यम हैं। सत्र संचालन अमन व्यास ने किया।

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